Tuesday, 20 August 2013

शर्म क्यों हमे ? मगर नहीं आती ......

14वें  विश्व एथलेटिक चैंपियनशिप का आयोजन मास्को, रूस मे 10 से 18 अगस्त 2013 तक किया गया । भारत को पिछले आयोजनों की तरह इस बार भी कोई मेडल नहीं मिल सका है जिसका उसे कोई गम नहीं । इसमे शायद आपको भी कोई आश्चर्य नहीं होगा ।  लेकिन मेडल तालिका देखने के बाद हममे  से  ज्यादातर  के सीने मे बेचैनी  हो सकती  है और हो सकता है गुस्से मे आपकी मुट्ठियाँ भिच जाए क्योंकि पदक तालिका मे ऐसे बहुत से देश मिल जाएंगे जिनकी भारत से अन्यथा कोई तुलना नही हो सकती । रूस का प्रथम, अमेरिका का दूसरे स्थान पर रहना किसी को भी अचंभित नही करेगा  लेकिन जमाइका (6 गोल्ड), कीन्या (5 गोल्ड), इथोपिया (3 गोल्ड), युगांडा (1 गोल्ड), त्रिनीडाड एंड टोबागों (1 गोल्ड), इवोरी कोस्ट(2 सिल्वर) और नाइजीरिया (1 सिल्वर और 1 कांस्य ) को पदक मिलना और भारत का इन छोटे छोटे अभाव ग्रस्त देशों से अत्यधिक पीछे रहना अवसाद पैदा करने वाला है । इथोपिया आज भी अकाल और भुखमरी के लिए जाना जाता है । ये शर्म का विषय है 125 करोड़ की जनसंख्या वाले देश के लिए और देश के नीति नियंताओं के लिए। आज़ादी के 66 वर्ष बाद भी खेलो की इस दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है ? खेलों की राजनीति या राजनीति का खेल ?
       भारत जैसे देशो की शर्म कम करने के लिए  विश्व एथलेटिक चैंपियनशिप के आयाजकों ने इस बार एक नुस्खा निकाला जिसके द्वारा सभी देशों के लिए एक क्रमांक तालिका बनाई गई जिससे ये पता चल सके कि प्रदर्शन के आधार पर  किस देश का कौन सा स्थान रहा । इस नुस्खे के अनुसार किसी प्रतिस्पर्धा मे गोल्ड मेडल को 8 अंक, सिल्वर को 7, कांस्य को 6, चौथे स्थान को 5, पांचवे स्थान को 4, छटवे को 3, सातवें को 2 और आठवें को 1 अंक देने का प्रविधान किया गया। यानी केवल आठवे स्थान तक के लिए अंको का प्रविधान किया गया । इस तरह से प्राप्त कुल अंको के आधार पर सभी देशो की सूची बनाई गई । किन्तु, भारत चूंकि सिर्फ एक प्रतिस्पर्धा मे सातवें स्थान पर रहा था ( अन्य मे आठवें के बहुत बाद रहा) इसलिए उसे केवल 2 अंक प्राप्त हो सके और उसका स्थान 53वां रहा । अमेरिका के 282 अंको के मुक़ाबले विश्व की इस तथाकथित संभावित तीसरी महाशक्ति भारत के केवल 2 अंक ।       
         एक और बात अचंभित करने वाली रही इस प्रतियोगिता का किसी भी समाचार पत्र और किसी भी टी वी चैनल पर कोई खास समाचार नही रहा और इसलिए अपनी दुर्दशा पर न किसी ने आँसू बहाए और न ही किसी को शर्म आने का सुअवसर प्राप्त हुआ । यहाँ  तक कि भारत के एथलेटिक की अधिकृत वेब साइट पर आज तक 13 अगस्त तक का विवरण है और इसमे कहा गया है कि कई खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन मे काफी सुधार किया है ।
      क्या होगा इस देश का जहां खिलाड़ी खेल  के लिए नहीं सरकारी नौकरी पाने के लिए खेलते है ? स्वाभाविक है बिना भाई भतीजावाद के यदि चयन हो जाय तो बहुत बड़ी बात होगी।ये सभी को इस हद तक मालूम है कि कोई भी समझदार व्यक्ति भरसक कोशिश करता है कि बच्चे खेलों पर समय खराब न करें।
     खिलाड़ियो को समुचित और मूलभूत सुविधाए नहीं और उस पर सारे खेल संघों पर राजनैतिक व्यक्तियों का कब्जा । कैसा है राजनीति और खेलों का घाल मेल ..... पता नहीं खेलों मे राजनीति है  या  राजनीति मे खेल। (for more detail please log on to http://lucknowtribune.blogspot.com ; http://mishrasp.blogspot.com http://lucknowcentral.blogspot.com )

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     शिव प्रकाश मिश्रा

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